सोमवार, 8 अगस्त 2011
इसी शाख़ पे रह जाऊँगा
शनिवार, 6 अगस्त 2011
दोगलापन
झुलसते दोपहर में रात जड़ दूं
है सोचा, तेरी यादों से, ये भर दूं.
भुला के वादे सब, पोशीदगी के,
शामे-महफ़िल तुम्हारे नाम कर दूं.
मैं जो हूँ, जैसा भी बना हूँ,
ये सब इनायत है तुम्हारी,
मगर इल्ज़ाम, इन नाकामियों का,
कहो कैसे, तुम्हारे सर ये मढ़ दूं.
तुम्हारी ख्वाहिशें, हैं ख्वाब मेरे,
तुम्हारा ग़म मेरी अश्कों में शामिल,
जरा कह के हमें तू देख हमदम,
झुलसते दोपहर में रात जड़ दूं.
किन्तु पर थमा जीवन
एक किन्तु पर थमा हुआ है, अर्धसत्य सा मेरा जीवन.
प्रत्येक क्षण डरता हूँ अघटित, अकथित संभावनाओं से,
तथापि पथभ्रष्ट नहीं हुआ,
गतिमान हूँ, विपरीत इस भेडचाल के.
अब अज्ञातवास के आखिरी सत्र में,
कहाँ मुड़ सकूंगा, प्रकाशित दिशाओं की ओर.
मित्र, तुम्हे शुभकामनायें मेरी,
चुन लो नया पथ तुम.
पथप्रदर्शक नहीं, अज्ञातवासी हूँ मैं,
ना लक्ष्य का भान है, ना ही चिंता उसकी.
पग भ्रमित हैं मेरे, मेरी ही भांति.
ये थमते नहीं, उस क्षण भी,
जब एक किन्तु पर थमा हो जीवन..
अब कौन सम्भाले मुझे
अब कहाँ पहचान पाते मेरे घरवाले मुझे,
बिखरा हूँ, कोई मुस्कुराकर जोड़ ही डाले मुझे.
टूट कर चाहूँ उसे, ये बात है लाजिम मगर,
डरता हूँ, ये चाह ही, कल तोड़ ना डाले मुझे.
इस शहर में कहकहों की महफ़िलें सजती रही,
देखकर बस रो पड़े, इक घर के कुछ जाले मुझे.
मयकशी पर रोक है, मयखाने सारे बंद हैं,
बेखुदी के हाल में, अब कौन सम्भाले मुझे.
नज़्म हैं बिखरे हुए, है काफिया भी तंग सा,
राह में जब से मिले, कल "चाहने वाले" मुझे.
उसने दामन दर्द से भर के दिया खैरात में,
अब एक कतरा प्यार उसका, मार ना डाले मुझे.