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गुरुवार, 6 मार्च 2014

Ghazal

कोई मुझसे ही गलती हो गयी है,
नज़र तेरी, जो नम सी हो गयी है।

उनींदी हैं, मेरी आँखें अभी तक,
सुबह कुछ आज, जल्दी हो गयी है।

जिकर जब भी, किया है मैंने तेरा,
इबारत सारी, गीली हो गयी है।

ज़रा पैसे, जो मेरे हाथ आये,
ख़ुशी बेबात, मँहगी हो गयी है।

फसल रोती रही है, पानियों बिन,
फलक पे खुश्क, बदली हो गयी है।

कभी मिलकर के तुम, वापस बिछड़ लो,
तुम्हारी याद, धुँधली हो गयी है।

लिखूँगा अब, मैं बस फरमाइशों पर,
कलम की, आज बिक्री हो गयी है।

मंगलवार, 4 मार्च 2014

Ghazal

अजब मशरूफ ये सारा ज़माना हो गया है,
लगे मकसद महज़, हमको हराना हो गया है।

यकीं किस्मत पे कर के, इन दिनों हम हैं बहुत खुश,
चलो नाकामियों का, इक बहाना हो गया है।

नज़ारे धुल गए हैं, अश्क की बारिश में जबसे,
हमारी दीद का मौसम, सुहाना हो गया है।

सुना त्योहार पर, अब चढ़ चुका है रंगे-मजहब,
बहुत मुश्किल यहाँ, होली मनाना हो गया है।

बड़ी शिद्दत से जिसको, ढूंढते हैं नज़्म में हम,
हमारा रब्त वो, कबका फ़साना हो गया है।
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मशरूफ- Busy
महज़- only
अश्क- Tears
दीद- Vision
शिद्दत- Passion
नज़्म- poem
रब्त- Relationship
फ़साना- story

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

Ghazal

खैर लाजिम है, हर इक बूँद का सहमा होना,
मिलके सागर से है, बेमानी सा दरिया होना।

भूख जैसी नहीं दुनिया में कोई चीज़ लगे,
हाए, हर तीसरे दिन का मेरे रोजा होना।

ख्वाब था, ख्वाब सी गुजरेगी तेरे साथ मगर,
जिन्दगी, रास कब आया तुझे सपना होना।

है मेरी जीस्त पे, यूँ सैकड़ों लोगों का असर,
पर बनाये मुझे मुझसा, मेरा मुझसा होना।

कितना भी जोड़ लूँ, रुकता नहीं है कुछ भी यहाँ,
उफ़ ये बरसात में, बरसात का दरिया होना।

मेरे अपने मुझे, अब देख के कतराते हैं,
जुर्म सा हो गया, इस मुल्क में क़स्बा होना।

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

Ghazal

ख़यालों से मेरे तल्खी हटा दो,
कलम से या मेरी स्याही हटा दो।

यहाँ अहसास कबके मर चुके हैं,
नए सपनों की सब अर्जी हटा दो।

परे दीवार के जब है अँधेरा,
तो इस दीवार से खिड़की हटा दो।

मैं ख्वाबों पर तभी लिख पाउँगा जब,
मेरे ख्वाबों से तुम रोटी हटा दो।

भला माज़ी पे कबतक सर धुनोगे,
दिलों से बात सब पिछली हटा दो।

मगर मुमकिन है कुछ भी कर गुज़रना,
जेहन पे गर घिरी बदली हटा दो।

Ghazal

अना की कब्र पर जबसे, गुलों को बो चुके हैं हम,
हमें लगने लगा है, फिर से जिंदा हो चुके हैं हम।

उगेंगे कल नए पौधे, यकीं कुछ यूँ हुआ हमको,
ज़मीं नम हो गयी है, आज इतना रो चुके हैं हम।

उतारे कोई अब तो, इन रिवाजों के सलीबों को,
छिले कंधे लिए, सदियों से इनको ढो चुके हैं हम।

मेरे सपने अभी तक डर रहे हैं, सुर्ख रंगों से,
हथेली से लहू यूँ तो, कभी का धो चुके हैं हम।

बची है अब कहाँ, मुँह में जुबाँ औ ताब आँखों में,
बहुत पाने की चाहत में, बहुत कुछ खो चुके हैं हम।

बुधवार, 22 जनवरी 2014

Ghazal

ये माना बिखरे रिश्तों में, भी कुछ बिखरा नहीं लगता,
मकाँ लेकिन अमीरों का, मुझे घर सा नहीं लगता।

मुझे परहेज कब है, महफ़िलों में मिलने-जुलने से,
मगर बेबात पे हँसना, मुझे अच्छा नहीं लगता।

भले कितनी ज़िरह कर लूँ, तेरे होने- न होने पर,
मेरी माँ को तेरा पलड़ा, कभी हल्का नहीं लगता।

न जाने क्यूँ ये कस्बाई, शहर की नींव बुनते हैं,
जो उनको इस कदर, बढ़ता शहर अपना नहीं लगता।

मुझे इतने ज़माने बाद, क्या पहचान पाओगे,
अभी तो अक्स भी मेरा, मुझे मुझसा नहीं लगता।

निखर आई है मेरी दीद, थोड़ी बावुजू होकर,
कि इस भीगी नज़र से, कोई अब धुंधला नहीं लगता।

जो पीछे मुड़ सकूँ तो, बेहतरी की थाह लूँ लेकिन,
यहाँ मसरूफियत है, माजी का मजमा नहीं लगता।

शनिवार, 11 जनवरी 2014

Ghazal

सब्ज़ सपने पिरो गयी शायद,
दिल में वो इश्क बो गयी शायद।

हर नज़र देखती है इस जानिब,
कुछ खता मुझसे हो गयी शायद।

भोर काँधे पे मेरी था काजल,
रात भर फिर वो रो गयी शायद।

भूल बैठा हूँ सूरते-साकी,
तिश्नगी दूर हो गयी शायद।

अब तो राहें हैं, सिर्फ राहें हैं,
एक मंजिल थी, खो गयी शायद।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

Ghazal

ये नज़र जाएगी, ये बदन जाएगा,
फिर भी दिल का कहाँ बाँकपन जाएगा।

सजदे में भी रहा चूमता जो जमीं,
किस तरह उसके दिल से वतन जाएगा।

बस इसी डर ने सोने दिया ना मुझे,
बेख़याली में सर से कफ़न जाएगा।

उसमें दिखने लगी हैं वही आदतें,
मुझको डर है, वो मुझसा ही बन जाएगा।

कुछ रूहानी नहीं, कुछ रूमानी नहीं,
कैसे तुझ तक ये मेरा सुखन जाएगा।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

Ghazal

अब स्याह निगाहों में, इक रंग गुलाबी है,
ये इश्क की लौ है जो, इस शब ने जला दी है।

रूटीन से जीने में ,तकलीफ नहीं  लेकिन,
क्यों नींद भला शब भर, आती है न जाती है।

कमरे में घुटन सी है, कुछ सोच नहीं पाता,
कमबख्त मुई खिड़की, खुलती ही ज़रा सी है।

जख्मों की दुकानों पर, मरहम है बहुत बिकता,
बम्बई के बजारों ने , ये बात सिखा दी है।

माना कि अना तुमको, करती थी बहुत रुसवा,
आ जाओ कि हमने वो, दीवार गिरा ली है।

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

Ghazal

सुझाने कुछ नयी तरकीब, सब बेनाम आये हैं,
शहर में गर्म है चर्चा, कि हम नाकाम आये हैं।

बहुत गाढ़े समय में, तुमने पकड़ाए थे जो रूपये,
कमाए लाख फिर भी, वो ही अब तक काम आये हैं।

उन्ही के नाम पर आती थी, मेरी चिट्ठियाँ सारी,
पिता खुश हैं कि ख़त अबके, हमारे नाम आये हैं।

मेरा घर है महकता रात भर, मीठी सी खुशबू से,
कि माँ के साथ परसों, टोकरी भर आम आये हैं।

भटक कर थक चुके हैं, जिन्दगी को ढूँढ करके अब,
तुम्हारे पहलू में करने, जरा आराम आये हैं।

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

Ghazal

छुपा डाले हैं दिल के दाग सब, मँहगे लिबासों में,
चलो कुछ होश बाकी है अभी, हम बद-हवासों में।

कोई तो मयकदे की टेबलों को, साफ़ कर दे अब,
फ़साने आह भरते हैं, यहाँ खाली गिलासों में।

फरक दिखता नहीं है, बंद आँखों से हमें फिर भी,
चमक मलमल की ढूंढे फिरते हैं, मोटे कपासों में।

बहुत ऊँची फ़सीलें हैं, तेरे चारों तरफ जानम,
हमारी सीढियाँ कमज़ोर हैं, घुन है असासों में।

मुझे अखबार की सुर्खी हमेशा झूठ लगती है,
खबर सच की लगाई है, यूँही अक्सर कयासों में।

 फ़साना- story फ़सीलें- walls असास- base कयास-guess

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

Ghazal

कल ही कहूँगा, आज तो वो सोगवार है,
दिल तब सुनेगा मेरी, इतना ऐतबार है।

आ चूम के पेशानी, अब मैं अलविदा कहूँ,
पर याद ये भी रख, कि तेरा इंतज़ार है।

कैदे-अना में है, कोई है चाहतों में बंद,
खुद पे किसी भी शख्स का ,कब इख़्तियार है।

मूँदे पलक है, भागता रहता है रात- दिन,
जाने शहर ये किस लिए, यूँ बेक़रार है।

सोचा सिवाए खुद के भी, सोचूँगा कुछ मगर,
खुद में उलझके आज भी, दिल शर्मसार है।

अब भी हैं सारी मुश्किलें, लेकिन तुम्हारे साथ,
हर खार जैसे बन गया, इक हरसिंगार है।

सोगवार : ग़मगीन
पेशानी: forehead
कैदे-अना : in captivity of ego
इख़्तियार: कब्ज़ा,control
खार: काँटा

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

Ghazal

सलामत हैं मेरी रातें, है साबुत हर सहर मेरा,
मगर जो लुत्फ़ लेता था, कहाँ है वो जिगर मेरा?

मेरे ख्वाबों को लाखों चाहिए, तामील होने तक,
मेरा शायर मगर खुश है, उसे प्यारा सिफ़र मेरा।

मेरी हर बदगुमानी को, सही कहने लगे हैं सब,
मुझे अपना समझता ही नहीं, अब ये शहर मेरा।

परेशानी यही बस एक है, तनहाई चुनने में,
जो मैं चुप हो गया तो, होता है खामोश घर मेरा।

बड़ा होकर वो फिर अपनी, नयी दुनिया बसा लेगा,
बड़े नाजों से पलता है, मेरे दिल का ये डर मेरा।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

Ghazal

तसल्ली की सदा आई, है इक बेशक्ल कोने से,
जो टूटे तो कहाँ जुड़ते, हैं कुछ रिश्ते पिरोने से।

करा रक्खी हैं ख़त की कॉपियाँ ,कुछ इस लिए क्यूँकी,
है धुल जाती इबारत, गमज़दा हर्फों पे रोने से।

नमी आँखों में है लेकिन, मेरे कुछ दोस्त कहते हैं,
कि मैंने पा लिया सबकुछ, फितूरे-इश्क खोने से।

हुआ मायूस लेकिन खैर, वो ये बात तो समझा,
खिलौने कब उगे हैं, इस तरह मिट्टी में बोने से।

वुजू करके लहू से, झुक गया हूँ सजदे में अक्सर,
बहुत खुश हूँ, मैं उसके हर जगह हो कर न होने से।

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

Ghazal

सुना जब बिक गया घर, शादियों की देनदारी से,
चमक फीकी पड़ी है चेहरे की, गोटा-किनारी से।

कमर रस्मे-परस्तिश में,मेरी अब है झुकी जाती,
बहुत उकता गया हूँ, बेवजह की खाकसारी से।

रहूँ जब होश में, तो सैकड़ों ग़म हैं सुलाने को,
तुम्हारी याद, बामुश्किल जगायी है खुमारी से।

सिवाए प्यार के तेरे, कमाई कुछ नहीं मेरी,
उमर कट जाएगी लेकिन, बस इतनी रेजगारी से।

चलो साझा करें हम, आज से सब गलतियाँ अपनी,
कहीं दूरी न बढ़ जाये, मुई मेरी- तुम्हारी से।

सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

Ghazal

अगर बस साँस लेना, होना है, बेशक मैं होता हूँ,
मगर सब मायने जीने के, यूँ होने में खोता हूँ।

हदें बढ़ने लगी हैं, जबसे सपनों की मेरे दिल में,
मैं खेतों से परे, सड़कों पे थोड़े ख्वाब बोता हूँ।

चरागों की तरफ से, जबसे आँखें मूँद ली मैंने,
जेहन बेनूर है लेकिन, सुकूँ के साथ सोता हूँ।

बचा के चन्द टुकड़े रोटियों के, कल की खातिर मैं,
बहुत शर्मिंदा होकर फिर उन्ही ख्वाबों को रोता हूँ।

मेरी गज़लों के सारे हर्फ़, अक्सर भीग जाते हैं,
तुम्हारे दर्द के किस्से, मैं जब इनमें पिरोता हूँ।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

Ghazal

सुखन* पे सख्त कुछ ऐसे, मुआ मौसम गुज़रता है,
किताबें हैं छुपी बैठी, फलक सारा टपकता है।

तसल्ली होती है , डर देख के अब्बू की आँखों में,
कोई तो है जो मुझको , आज भी बच्चा समझता है।

तरक्की की दलीलें बेवजह हैं, जब तलक कोई,
किसी फुटपाथ पे बस दो निवाले को तरसता है।

तुझे आहों से मेरी, अब कभी तकलीफ ना होगी,
कि तेरा गम बिला आवाज़, अब दिल में सिसकता है।

भला इन वाह के, इन दाद के शेरों से क्या होगा,
मुकम्मल तब ग़ज़ल है, आह जब दिल में पसरता है।

*poem

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

Ghazal

किसी भूली कहानी का, कोई किरदार दिखता है,
मेरा क़स्बा मुझे , अब सिर्फ इक बाज़ार दिखता है।

कि जैसे सर के बदले, आईनें हों सबके कन्धों पर,
मुझे हर शख्स मुझसा ही, यहाँ लाचार दिखता है।

यही इक मर्ज़ है उसका ,दवा भी बस यही उसकी,
शहर, चाहत में पैसे की, बहुत बीमार दिखता है।

बचेगी किस तरह मुझमें, किसी मंजिल की अब हसरत,
समंदर के सफ़र में, बस मुझे मंझधार दिखता है।

न कोई रब्त है, ना गम, न कुछ बाकी तमन्नाएँ,
ये शायर शय से सारी, इन दिनों बेज़ार दिखता है।

बुधवार, 3 जुलाई 2013

Ghazal

जिसे देखो मेरी जानिब, निगाहे- सर्द देता है,
नहीं जीने मुझे, ये हसरते-हमदर्द देता है।

ज़माना बदगुमाँ होकर, हुआ है बेतकल्लुफ सा,
वो आँखें डाल कर आँखों में , मुझको दर्द देता है।

भला आवारापन इसके सिवा, अब और क्या देगा,
अबूझे चाह के लम्बे सफ़र की गर्द देता है।

मिरे शायर को है मालूम, सारे रंग-बू यूं तो,
मगर नज्मों को सूरत, जाने क्यूँ वो ज़र्द देता है।

बुधवार, 19 जून 2013

Ghazal

हमेशा कल पे हमने देखी टलती, चाँद सी रोटी,
धुँआई अश्क में बेबस सिसकती, चाँद सी रोटी।

तुम्हारी अलहदा ख्वाहिश, तुम्हारे अलहदा सपने,
हमें तो ख्वाब में भी बस है दिखती, चाँद सी रोटी।

हो झगड़ा तेरा-मेरा, इसका-उसका जिसका-तिसका हो,
ये कैसी आग है फैली, कि जलती चाँद सी रोटी।

शहर में बेचने वाले, बहुत कुछ बेच देते हैं,
यहाँ सबसे है लेकिन, मंहगी बिकती चाँद सी रोटी।

सुबह से शाम तक पीछा करूँ, मैं इक निवाले का,
मगर कमबख्त कब देखें, है थमती चाँद सी रोटी।