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शनिवार, 6 अगस्त 2011

अब कौन सम्भाले मुझे

अब कहाँ पहचान पाते मेरे घरवाले मुझे,

बिखरा हूँ, कोई मुस्कुराकर जोड़ ही डाले मुझे.


टूट कर चाहूँ उसे, ये बात है लाजिम मगर,

डरता हूँ, ये चाह ही, कल तोड़ ना डाले मुझे.


इस शहर में कहकहों की महफ़िलें सजती रही,

देखकर बस रो पड़े, इक घर के कुछ जाले मुझे.


मयकशी पर रोक है, मयखाने सारे बंद हैं,

बेखुदी के हाल में, अब कौन सम्भाले मुझे.


नज़्म हैं बिखरे हुए, है काफिया भी तंग सा,

राह में जब से मिले, कल "चाहने वाले" मुझे.


उसने दामन दर्द से भर के दिया खैरात में,

अब एक कतरा प्यार उसका, मार ना डाले मुझे.

बुधवार, 25 मई 2011

ग़म सहेजना इतना आसान नहीं

कितने अजीब हैं ये बादल भी,
महीनों तक सहेजते रहते हैं ग़मों को,
रात- दिन भटकते हुए, ग़मगीन शक्लें बनाकर।
कभी छुपाते हैं चाँद, सूरज, सय्यारों को,
कभी खुद ही छुप जाते हैं।

और जब पलकों तक भर आता है गम,
तो बस उड़ेल देते हैं,
भीग जाती है जमीं सर से पैरों तक।

बहुत समझाया कि दूसरों के गम सहेजना इतना आसान नहीं।

रविवार, 8 मई 2011

बेवज़ह

क्यूँ मुंडेरों पर परिंदे, हैं मचलते बेवज़ह,
पर क़तर डाले हैं फिर भी, कोशिशें ये...बेवज़ह।

अपनी दूरी का सबब भी मैं ही था माना, मगर,
अब भी नज़रें ढूंढती हैं, उसको ही क्यूँ बेवज़ह।

शब जो मैंने चाँद देखा, कुछ था धुंधला-धुंधला सा,
जाने फिर क्या याद आया, पुर-नम हैं आँखें बेवज़ह।

'फिर मिलेंगे' कह गया वो, छू के पेशानी मेरी,
जब है वादा वस्ल का तो, हिज्र का ग़म बेवज़ह।

तेरी रातें, तेरे सपने, तेरे सारे दर्द-ओ-ग़म,
जब हैं सारी बातें तेरी, 'हम' का चर्चा बेवज़ह।

अपनी बीनाई लुटाकर, खुश बहुत हूँ आज-कल,
जब शहर भर है अँधेरा, फिर देखना क्या बेवज़ह।