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शनिवार, 6 अगस्त 2011

झुलसते दोपहर में रात जड़ दूं

ये सूनापन, ये दिल के खाली सफ़हे,
है सोचा, तेरी यादों से, ये भर दूं.
भुला के वादे सब, पोशीदगी के,
शामे-महफ़िल तुम्हारे नाम कर दूं.

मैं जो हूँ, जैसा भी बना हूँ,
ये सब इनायत है तुम्हारी,
मगर इल्ज़ाम, इन नाकामियों का,
कहो कैसे, तुम्हारे सर ये मढ़ दूं.

तुम्हारी ख्वाहिशें, हैं ख्वाब मेरे,
तुम्हारा ग़म मेरी अश्कों में शामिल,
जरा कह के हमें तू देख हमदम,
झुलसते दोपहर में रात जड़ दूं.

शुक्रवार, 10 जून 2011

बरसों तक

एक फूल संभाल कर रखा था मैंने, बरसों तक,
देखना अब भी कोट की अगली जेब में पड़ा हो शायद।

वक़्त के साथ सूख भले ही गया हो,
पर रंग-ओ-बू अब भी बाकी होगी उसमे।
टटोलने पर शायद, यादों में, वो दिन भी मिल जाये कहीं।
देखना, मैं अब भी बस स्टैंड पर इंतज़ार तो नहीं कर रहा।

उत्सुक, चौकन्ना सा, हर आने-जाने वालों से नज़रें चुराता हुआ कोई दिखे,
तो पास बुला लेना।
क्या पता, एक फूल संभाल कर रखा हो उसने भी बरसों तक।

गुरुवार, 26 मई 2011

आज तक लहरों के संग बहे

है रंज हमको, दर्द में वो तन्हा क्यूँ रहे,
थी फ़िक्र उनको, उनका ग़म क्यूँ दूसरा सहे।

इतना तो जिंदगी में सुकूँ भी मिले हमें,
सोये अगर तो जागने की फ़िक्र ना रहे।

दुनिया ने कबके छीन ली, पतवार हाथ से,
हम भी बजिद थे, आज तक लहरों के संग बहे।

हर वक़्त दूसरों के लिए जीना ठीक है,
पर काश दूसरों में कोई आप सा रहे।

रविवार, 3 अप्रैल 2011

जैसे कि बीमार को मिल जाये इक वजहे-करार..

मेरी सज़दाए-जबीं, है तेरे क़दमों पे निसार,
तू ही रौनक मेरे दिन का, तू ही शब का है निखार।

जब सुनी आमद कि तेरी, कुछ तो है ऐसा हुआ,

जैसे कि बीमार को मिल जाये इक वजहे-करार।

मेरे सारे अश्क ले कर, छुप के खुद रोता रहा,

या तो मैं हूँ नासमझ, या तूने तोडा है करार।


कसमकस है क्या कहूँ, वो मर्ज़ है या चारागर,

वो ही ग़म देता है मुझको, वो ही बनता गमगुसार।

बहुत ही खूँ निकलता है..

सितारे जब कभी टूटे, बहुत तकलीफ होती है,
अगर आँखों में चुभ जाये, बहुत ही खूँ निकलता है।

कभी जब रात भर जागा, शहर की रौशनी में मैं,
सुबह सूरज से पूछा है, भला तू क्यूँ निकलता है।

हूँ तबसे मुन्तजिर, तू छोड़ कर जबसे गया हमको,
मिला जो पूछ बैठूँगा, बोलो भला कोई यूँ निकलता है।

मंगलवार, 22 मार्च 2011

ये चलो अच्छा हुआ

ग़मज़दा पलकें न देखी, ये चलो अच्छा हुआ।
पूछ बैठे हाल क्या है, ये चलो अच्छा हुआ।

तुम अगर कुछ फूल लाते, तो नयी क्या बात थी,
सारे चुनकर खार लाये, ये चलो अच्छा हुआ।

हँस के जो दो बात कर ली, भींग सी पलकें गयी,
तल्खिये- अंदाज़ भूले, ये चलो अच्छा हुआ।

तेरी महफ़िल में न आते, मुतमईन से रहते हम,
बेरुखी ने जान भर दी, ये चलो अच्छा हुआ।

अच्छा नहीं लगता

तेरा नूरानी चेहरा बेनकाब, अच्छा नहीं लगता,
तेरा ये खुश्क अंदाज़े- जवाब अच्छा नहीं लगता।

शहर में आये हो, कुछ अपना अंदाज़ तो बदलो,
भीड़ झूठों कि हो, और सच में जवाब... अच्छा नहीं लगता।

मुझे आईने भी अब कहाँ पहचान पाते हैं ,
रोज़ चेहरे पर, नया इक नकाब, अच्छा नहीं लगता।

सोचा मांग लूं, वो जिसको हम कब से तरसते हैं,
ये अपने बीच का कौमी हिजाब, अच्छा नहीं लगता।

जो दिन में बात करता है, कोई भूखा न सो जाये,
उसी कि शामों में जामे- शराब , अच्छा नहीं लगता।