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सोमवार, 8 अगस्त 2011

इसी शाख़ पे रह जाऊँगा

तेरे बगैर अब जाने मैं क्या कर पाऊँगा,
हरेक सुबह खुद, अपने ही साए से सहम जाऊँगा.

मैं हूँ परछाई इक, इतना भी न चाहो मुझको,
इन अंधेरों में कभी, साथ ना आ पाऊँगा.

गुलों के रंग-ओ-बू, फैलेंगे सरे-बाज़ार कभी,
मैं तो हूँ खार, इसी शाख़ पे रह जाऊँगा.

मसअला सब का यहाँ, एक सा ही है हमदम,
"ख़ुद ही बिखरा हूँ, भला क्या तुझे दे पाऊँगा."

गुज़ारिश जिंदगी से हर घड़ी कि दो घड़ी थम ले,
ना जाने दो घड़ी में, तेरी खातिर, ऐसा क्या कर जाऊँगा.

शनिवार, 26 मार्च 2011

दो पहलू

मायूसी:
दिन गया आवारगी में, शब को नाकारा फिरा,
जब भी खुद को देख पाया, अपनी नज़रों से गिरा।

तिश्नगी अब न रही, ता-उम्र जो हमराह थी,
खो गया वो ख्वाब भी, जब खुद ही वादे से फिरा।

उम्मीद:
एक कतरा प्यार का, एक लफ्ज़ कि कारीगरी,
इतने से ही जोड़ लूं मैं, टूटे रिश्तों का सिरा।

मैंने दामन इश्क का छोड़ा नहीं, उस वक़्त भी,
आँखें थी जलती हुई जब, दिल था नफरत से घिरा।

बेबसी

चन्द सिक्के फटी जेब में लिए , बराए- उम्मीद मुस्कुराता हूँ मै।
रोज अपने संगे दिल को अश्कों से पिघलाता हूँ मैं।

दौलते इश्क कब का खो भी चुका, रो भी चुका,
जीतने नफरत जहाँ की, हर रोज चला जाता हूँ मैं।

देखना चाहूँ जो खुद को, आईना मुँह फेर ले,
क़त्ल कर के खुद अना का, खुद ही शरमाता हूँ मैं।

तुम भी मानोगे, जो कहता हूँ मैं अक्सर रात-दिन,
इस भरी महफ़िल की तन्हाई से घबराता हूँ मैं।