आज अरसे बाद, सोचा कुछ लिखूँ उसके बारे में।
एक पुराना वादा था, शायद पूरा हो जाये।
सोचते- सोचते आधी गुजर चुकी है रात,
इतना कुछ एक नज़्म में कैसे समाएगा भला?
कैसे कह पाऊँगा वो सब, मैं इन चंद शब्दों में,
जो कोई भी कह न पाया, गुजरी कितनी सदियों में।
दिल के सफहों को पलट के कई बार पढ़ चूका हूँ मैं,
हर दफा लगता है, कुछ पन्ने छूट से गए हों।
कुछ अनकहा- अनसुना सा रह गया, जो कहीं दर्ज नहीं,
सोचता हूँ उससे मिल कर पूछ लूँगा।
और वो मेरी उलझनों से बेखबर, मुन्तजिर होगी कि कोई नज़्म पढूं।
हर आहट पे उठ बैठती होगी, कहीं ये नज़्म का उन्वान तो नहीं।
पर क्या करूँ, आज भी शायद वादा पूरा हो न पाया।
टाल कर मैं रह गया, आज भी उन ख्वाहिशों को,
जब सोचा था, लिखूंगा कुछ उसके बारे में,
आज अरसे बाद।
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मंगलवार, 12 अप्रैल 2011
है खुदी की ज़द में ही सारी खुदाई
झुका सजदे में जब भी मैं, ज़मीं से है सदा आयी,
किसी की बन्दगी क्यूँ, है खुदी की ज़द में ही सारी खुदाई।
जिसे कहती रही दुनिया, ना मिलना बेवफा है वो,
उसी ने थामा है अबके, सिखलाई हमें अब आशनाई।
ना जाने हाल क्या हो , जब फ़रिश्ते बन्दगी में हों,
भला राहें दिखाए कौन, हो किसकी रहनुमाई।
किसी की बन्दगी क्यूँ, है खुदी की ज़द में ही सारी खुदाई।
जिसे कहती रही दुनिया, ना मिलना बेवफा है वो,
उसी ने थामा है अबके, सिखलाई हमें अब आशनाई।
ना जाने हाल क्या हो , जब फ़रिश्ते बन्दगी में हों,
भला राहें दिखाए कौन, हो किसकी रहनुमाई।
रविवार, 3 अप्रैल 2011
जैसे कि बीमार को मिल जाये इक वजहे-करार..
मेरी सज़दाए-जबीं, है तेरे क़दमों पे निसार,
तू ही रौनक मेरे दिन का, तू ही शब का है निखार।
जब सुनी आमद कि तेरी, कुछ तो है ऐसा हुआ,
जैसे कि बीमार को मिल जाये इक वजहे-करार।
मेरे सारे अश्क ले कर, छुप के खुद रोता रहा,
या तो मैं हूँ नासमझ, या तूने तोडा है करार।
कसमकस है क्या कहूँ, वो मर्ज़ है या चारागर,
वो ही ग़म देता है मुझको, वो ही बनता गमगुसार।
तू ही रौनक मेरे दिन का, तू ही शब का है निखार।
जब सुनी आमद कि तेरी, कुछ तो है ऐसा हुआ,
जैसे कि बीमार को मिल जाये इक वजहे-करार।
मेरे सारे अश्क ले कर, छुप के खुद रोता रहा,
या तो मैं हूँ नासमझ, या तूने तोडा है करार।
कसमकस है क्या कहूँ, वो मर्ज़ है या चारागर,
वो ही ग़म देता है मुझको, वो ही बनता गमगुसार।
बहुत ही खूँ निकलता है..
सितारे जब कभी टूटे, बहुत तकलीफ होती है,
अगर आँखों में चुभ जाये, बहुत ही खूँ निकलता है।
कभी जब रात भर जागा, शहर की रौशनी में मैं,
सुबह सूरज से पूछा है, भला तू क्यूँ निकलता है।
हूँ तबसे मुन्तजिर, तू छोड़ कर जबसे गया हमको,
मिला जो पूछ बैठूँगा, बोलो भला कोई यूँ निकलता है।
अगर आँखों में चुभ जाये, बहुत ही खूँ निकलता है।
कभी जब रात भर जागा, शहर की रौशनी में मैं,
सुबह सूरज से पूछा है, भला तू क्यूँ निकलता है।
हूँ तबसे मुन्तजिर, तू छोड़ कर जबसे गया हमको,
मिला जो पूछ बैठूँगा, बोलो भला कोई यूँ निकलता है।
थी जिंदगी कब काम की
हाथ तस्बीहें लिए था, दिल में तड़प पर जाम की,
देखें हो क्या इब्तेदा अब, खुशनुमा इस शाम की।
कोई हमसे पूछ बैठा, क्या है अंदाज़े- सुकून,
हँस के हमने ये कहा, थी जिंदगी कब काम की।
कितनी सदियाँ कट गयी, खुद से खुदी की जंग में,
अब तो रहमत बख्स मौला, दे दो घडी आराम की।
देखें हो क्या इब्तेदा अब, खुशनुमा इस शाम की।
कोई हमसे पूछ बैठा, क्या है अंदाज़े- सुकून,
हँस के हमने ये कहा, थी जिंदगी कब काम की।
कितनी सदियाँ कट गयी, खुद से खुदी की जंग में,
अब तो रहमत बख्स मौला, दे दो घडी आराम की।
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