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रविवार, 3 अप्रैल 2011

थी जिंदगी कब काम की

हाथ तस्बीहें लिए था, दिल में तड़प पर जाम की,
देखें हो क्या इब्तेदा अब, खुशनुमा इस शाम की।

कोई हमसे पूछ बैठा, क्या है अंदाज़े- सुकून,
हँस के हमने ये कहा, थी जिंदगी कब काम की।

कितनी सदियाँ कट गयी, खुद से खुदी की जंग में,
अब तो रहमत बख्स मौला, दे दो घडी आराम की।

मंगलवार, 29 मार्च 2011

फिर से भरमाया तुम्हें

इक अधूरी शाम दे कर, फिर से तरसाया तुम्हें,
वस्ल का वादा किया, यूँ फिर से भरमाया तुम्हें।

तू अगरचे साथ होता, जीत लेता मैं जहाँ,
अपनी नाकामी छुपा ली, बाकी बतलाया तुम्हें।

जिंदगी वो क्या कि जिसमे दूसरे न हों शरीक,

खुद ही जो समझा नहीं मैं, वो ही समझाया तुम्हें।


अपने हिस्से कि ख़ुशी से एक छत तामीर की,

धुप हो गम कि तो शायद दे सकूँ साया तुम्हें।