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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

जिंदगी इन दिनों कुछ बेतरतीब सी है..

जिंदगी इन दिनों कुछ बेतरतीब सी है।

कुछ इस तरह भटकती हैं इच्छाएं,

जैसे उठता है अभी-अभी बुझे किसी चराग से धुआं

जैसे फैला हो बाढ़ का पानी, दूर तक .... खेतों में।

जैसे बेवजह आवाजें करते हों परिंदे, आधी रात के बाद।
जानता हूँ कि अमरबेल सी लिपटी रहेंगी ये,

तब तक, जब कि छोड़ दूं कोशिशें,


फिर एक दिन सब सहज हो जायेगा,

पर अभी....अभी तो जिंदगी बेतरतीब सी है।

रविवार, 3 अप्रैल 2011

थी जिंदगी कब काम की

हाथ तस्बीहें लिए था, दिल में तड़प पर जाम की,
देखें हो क्या इब्तेदा अब, खुशनुमा इस शाम की।

कोई हमसे पूछ बैठा, क्या है अंदाज़े- सुकून,
हँस के हमने ये कहा, थी जिंदगी कब काम की।

कितनी सदियाँ कट गयी, खुद से खुदी की जंग में,
अब तो रहमत बख्स मौला, दे दो घडी आराम की।