है अवचेतन में कोई,
शौर्य है, साहस भी है जिसमे।
है निर्भीक वो,
बल भी है, बल का ज्ञान भी उसमे।
ये सब कहने की बातें हैं,
मैं अन्दर तक डरा सा हूँ।
सोमवार, 2 मई 2011
शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011
त्रिवेणी (inspired by Gulzar)
१।
पौ फटे से टांक लेता हूँ, अदद इक दिन,
शाम तक फिर तार-तार हो जाती है चादर।
उलझना होगा कल सुबह, मुझे फिर सूई- धागों से।
२।
याद नहीं, कभी गुफ्तगू हुई कि नहीं,
जब भी मिले हम राह में, रस्मन मुस्कुराये हैं।
आइनों से गहरी यारी की नहीं जाती।
३।
है सोचा जब, कि लिखूं नज़्म फिर से इक नयी कोई,
हर दफा देखा है मुड़कर चाँद की जानिब।
गोया चाँद है, बस हामिला1 मेरे ख्यालों से।
1. pregnant
पौ फटे से टांक लेता हूँ, अदद इक दिन,
शाम तक फिर तार-तार हो जाती है चादर।
उलझना होगा कल सुबह, मुझे फिर सूई- धागों से।
२।
याद नहीं, कभी गुफ्तगू हुई कि नहीं,
जब भी मिले हम राह में, रस्मन मुस्कुराये हैं।
आइनों से गहरी यारी की नहीं जाती।
३।
है सोचा जब, कि लिखूं नज़्म फिर से इक नयी कोई,
हर दफा देखा है मुड़कर चाँद की जानिब।
गोया चाँद है, बस हामिला1 मेरे ख्यालों से।
1. pregnant
सोमवार, 25 अप्रैल 2011
खुद से चुप्पी की आस रहती है
शब1 तलाशती है अँधेरा कोना, दिन में साए की आस रहती है,
क्यूँ उजालों से भर गया है दिल, क्यूँ अंधेरों की प्यास रहती है।
खोया क्या आज सोचता हूँ मैं, जो भी थी कल की नेमतें2, हैं बची,
जाने क्यूँ फिर उदास रहता हूँ, जाने किसकी तलाश रहती है।
सुबह निकला हूँ रूह से छुपकर, शाम ये सर पे चढ़ के बोलेगा,
एक उम्मीद अमन की है अब भी, खुद से चुप्पी की आस रहती है।
1. Night
2. Gifts
क्यूँ उजालों से भर गया है दिल, क्यूँ अंधेरों की प्यास रहती है।
खोया क्या आज सोचता हूँ मैं, जो भी थी कल की नेमतें2, हैं बची,
जाने क्यूँ फिर उदास रहता हूँ, जाने किसकी तलाश रहती है।
सुबह निकला हूँ रूह से छुपकर, शाम ये सर पे चढ़ के बोलेगा,
एक उम्मीद अमन की है अब भी, खुद से चुप्पी की आस रहती है।
1. Night
2. Gifts
शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011
एक मुद्दत से हूँ बैठा कि कोई बात चले
एक मुद्दत से हूँ बैठा कि कोई बात चले।
तुम पूछ लो कुछ, जिसमे कोई सवाल ना हो,
मैं दूं जवाब, जो दरअसल जवाब ना हो।
तेरे लफ़्ज़ों से ना तल्खी1 की महक आये मुझे,
जो दिखे मुझको वो ताअस्सुर2 भी खुशगवार रहे।
ना हो वो रोज़ की बातें कि जैसे ख़बरें हों,
कहूं मैं कुछ, तो न लगे कि अभी झगडे हों।
हो गर जिरह3 भी तो बातों के एक से सिरे निकलें,
लफ्ज़ की राहों में गुल ही हों, कांटें न जड़े निकलें।
सिक्के में, जिंदगी के, पहलू मिले तो एक मिले,
एक मुद्दत से हूँ बैठा कि कोई बात चले।
1. bitterness
2. expressions
3. argument
तुम पूछ लो कुछ, जिसमे कोई सवाल ना हो,
मैं दूं जवाब, जो दरअसल जवाब ना हो।
तेरे लफ़्ज़ों से ना तल्खी1 की महक आये मुझे,
जो दिखे मुझको वो ताअस्सुर2 भी खुशगवार रहे।
ना हो वो रोज़ की बातें कि जैसे ख़बरें हों,
कहूं मैं कुछ, तो न लगे कि अभी झगडे हों।
हो गर जिरह3 भी तो बातों के एक से सिरे निकलें,
लफ्ज़ की राहों में गुल ही हों, कांटें न जड़े निकलें।
सिक्के में, जिंदगी के, पहलू मिले तो एक मिले,
एक मुद्दत से हूँ बैठा कि कोई बात चले।
1. bitterness
2. expressions
3. argument
शनिवार, 16 अप्रैल 2011
जिंदगी इन दिनों कुछ बेतरतीब सी है..
जिंदगी इन दिनों कुछ बेतरतीब सी है।
कुछ इस तरह भटकती हैं इच्छाएं,जैसे उठता है अभी-अभी बुझे किसी चराग से धुआं ।
जैसे फैला हो बाढ़ का पानी, दूर तक .... खेतों में।जैसे बेवजह आवाजें करते हों परिंदे, आधी रात के बाद।
जानता हूँ कि अमरबेल सी लिपटी रहेंगी ये,
तब तक, जब कि छोड़ न दूं कोशिशें,
फिर एक दिन सब सहज हो जायेगा,
पर अभी....अभी तो जिंदगी बेतरतीब सी है।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)