मंगलवार, 11 मार्च 2014

Ghazal

ये माना तुमको हर सूरत, इरादों को कुचलना है,
सुनो अपना इरादा भी, हमें तुमको बदलना है।

अगर दरिया बने हैं हम, तो फिर राहों की परवा क्या?
जिधर भी रास्ता निकले, उधर ही चल निकलना है।

यूँही बस कोसते रहने से, दुनिया है बदलती कब,
करो या मान लो नाहक, लहू का यूँ उबलना है।

सुना आसान होता है, ढलानों पर सफ़र करना,
मगर मुश्किल उमर का बेसबब, बेबात ढलना है।

अभी से कह न मुड़ने को, अभी बाकी है कितना कुछ,
अभी गिरना है ठोकर पे, अभी गिर के संभलना है।

आखिर दस मिनट होते ही कितने हैं?

आखिर दस मिनट होते ही कितने हैं?
बहुत कम लगते थे, दस मिनट अब तक मुझे,
थोड़ी देर की जगह, बड़ी बेरहमी से इस्तेमाल करता रहा हूँ इसे,
बस दस मिनट में मिलता हूँ,
या दस मिनट और लगेंगे,
ये जुमले तुमने भी कई बार सुने होंगे मुझसे।

पर आज जब बस दस मिनट के लिए मिला उससे,
तो जैसे कई साल पहले गुज़ारे हुए कई साल,
फिर से गुज़र गए।
बातें जितनी थी, सब धरी की धरी रह गयी,
पर बातों का क्या है, फिर हो जाएँगी।
आखिर वो कह के गया है,
अगली बार आएगा तो दस मिनट के लिए ही सही, मिलेगा ज़रूर।
दस मिनट तो निकाल ही सकते हैं हम।
आखिर दस मिनट होते ही कितने हैं?

गुरुवार, 6 मार्च 2014

Ghazal

कोई मुझसे ही गलती हो गयी है,
नज़र तेरी, जो नम सी हो गयी है।

उनींदी हैं, मेरी आँखें अभी तक,
सुबह कुछ आज, जल्दी हो गयी है।

जिकर जब भी, किया है मैंने तेरा,
इबारत सारी, गीली हो गयी है।

ज़रा पैसे, जो मेरे हाथ आये,
ख़ुशी बेबात, मँहगी हो गयी है।

फसल रोती रही है, पानियों बिन,
फलक पे खुश्क, बदली हो गयी है।

कभी मिलकर के तुम, वापस बिछड़ लो,
तुम्हारी याद, धुँधली हो गयी है।

लिखूँगा अब, मैं बस फरमाइशों पर,
कलम की, आज बिक्री हो गयी है।

मंगलवार, 4 मार्च 2014

Ghazal

अजब मशरूफ ये सारा ज़माना हो गया है,
लगे मकसद महज़, हमको हराना हो गया है।

यकीं किस्मत पे कर के, इन दिनों हम हैं बहुत खुश,
चलो नाकामियों का, इक बहाना हो गया है।

नज़ारे धुल गए हैं, अश्क की बारिश में जबसे,
हमारी दीद का मौसम, सुहाना हो गया है।

सुना त्योहार पर, अब चढ़ चुका है रंगे-मजहब,
बहुत मुश्किल यहाँ, होली मनाना हो गया है।

बड़ी शिद्दत से जिसको, ढूंढते हैं नज़्म में हम,
हमारा रब्त वो, कबका फ़साना हो गया है।
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मशरूफ- Busy
महज़- only
अश्क- Tears
दीद- Vision
शिद्दत- Passion
नज़्म- poem
रब्त- Relationship
फ़साना- story

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

Ghazal

खैर लाजिम है, हर इक बूँद का सहमा होना,
मिलके सागर से है, बेमानी सा दरिया होना।

भूख जैसी नहीं दुनिया में कोई चीज़ लगे,
हाए, हर तीसरे दिन का मेरे रोजा होना।

ख्वाब था, ख्वाब सी गुजरेगी तेरे साथ मगर,
जिन्दगी, रास कब आया तुझे सपना होना।

है मेरी जीस्त पे, यूँ सैकड़ों लोगों का असर,
पर बनाये मुझे मुझसा, मेरा मुझसा होना।

कितना भी जोड़ लूँ, रुकता नहीं है कुछ भी यहाँ,
उफ़ ये बरसात में, बरसात का दरिया होना।

मेरे अपने मुझे, अब देख के कतराते हैं,
जुर्म सा हो गया, इस मुल्क में क़स्बा होना।