शनिवार, 13 मार्च 2010

जब गहराता है अँधेरा मन के चारों तरफ

जब गहराता है अँधेरा मन के चारों तरफ,
मैं गालियाँ देता हूँ तुम्हे, और घर के लोग प्रार्थनाएं।
पर तुम, तुम तो पत्थर के हो न, ना गालियाँ सुन पाते हो
ना प्रार्थनाएं।
फिर एक आदमी आता है, जो बिलकुल मेरी तरह नहीं होता।
अजीब सी बोली, अजीब से कपडे,
अहम् से भरा हुआ, पर चेहरे पर झूठी शांति लिए हुए।
कहता है, मुझे करने दो प्रार्थनाएं, वो मेरी कौम का है।

करता है प्रार्थनाएं तुम्हारी और बदले में मेरा तर्क छीन जाता है।
घर के लोग आशीर्वाद लेते हैं उसका, पर मैं तुमसे और दूर हो जाता हूँ।

और तब ज्यादा गहराता है अँधेरा, मन के चारों तरफ।

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

बस ...देखते जाइये

इस सारी व्यवस्था में शांति बनाये रखने वाले चाहते हैं,
कि तुम देखो पर तुम्हे एहसास न हो दिखने का।
तुम अपने बहरेपन का ढोंग लिए सुनो,
हर घुटी हुई चीख को।
तुम बोलो पर ध्यान रहे,
आवाज़ बिलकुल नहीं आनी चाहिए।
क्योंकि उठती हुई आवाजों से
मच जायेगा कोलाहल, भंग होगी शांति और,
व्यर्थ जायेगा परिश्रम उन तथाकथिक शांतिदूतों का।
इसलिए इस व्यवस्था और फैली हुई शांति को,
हो रहे हादसों के बीच,
देखिये और देखते जाइये,
बस.... देखते जाइये।

बस एक ख्वाब

एक ख्वाब बचाकर रखा है मैंने,
सबकी नज़र से, सिर्फ अपने लिए।
कोई अहमियत नहीं उसकी दुनिया के लिए पर,
जुडा है उसका एक-एक कतरा तुमसे।
मैं चाहता हूँ कि देख पाऊ तुम्हे,बस एक नज़र।
जानता हूँ जबकि कुछ नहीं कहना है मुझे,
(फिर कुछ क्यूँ अनकहा रहा हमारे बीच।)
बस मैं चाहता हूँ कि खो जाऊ गुमनामी के अँधेरे में,
तुम्हे देखने के बाद।

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

गहराता धुंधलका

मैं महसूस करता हूँ, हर पल दूर जाती हुई तुम्हारे क़दमों की आहट।
शाम के धुंधलके के नज़र आता है एक साया...
मैं आवाजें देता हूँ, अजीब सी खामोश आवाजें।
जो तुम तक पहुँचती तो हैं, पर उसे तुम
अनसुना कर बढ़ते चले जाते हो।
एक मोड़ पर पलटते हो , तो बस
अपरिचय झलकता है तुम्हारी आंखों से।
मुड जाते हो तुम उस मोड़ से, और
छोड़ जाते हो
आंखों में गहराता धुंधलका...

बस, मत जाओ दीदी

कितना सूना सा लगेगा घर,
जब तुम चली जाओगी।
मैं पल भर में बड़ा हो जाऊंगा,
ना रूठूंगा, ना ही रोक पाउँगा तुम्हे।
पापा अपनी फीकी मुस्कराहट में,
छुपा नही सकेंगे अपने आंसू।
और तुम, उनकी लाडली, जार- जार रोये जाओगी
माँ की गोद में।
मैं सूखी आँखों से बस देखूंगा तुम्हे...
(पता नही क्यूँ तुम्हारे जाने की ख़बर ने,
मुझे बड़ा बना दिया है।)
तुम मुझसे लग कर रोने लगोगी...
और मैं... मैं तो ये भी नही कह पाउँगा...
" मुझे मेरा बचपन लौटा दो
बस, मत जाओ दीदी"