सोमवार, 15 अप्रैल 2013

Bikhre sher

कटी है जिस तरह, उससे कोई शिकवा नहीं लेकिन,
कसक गुमनाम रहने की, जो थी सो अब भी कायम है।

Bikhre sher

दुआ के साथ पैसे थोड़े, अबके छोड़ आया हूँ,
सुना बेदाम चीज़ें, तुझ तलक अब जा नहीं पातीं।

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

Bikhre sher

दुआएं भेज दूँ लेकिन, कहाँ तुम तक वो पहुचेंगी,
खुदाओं में हमारे और तुम्हारे,अब भी झगड़ा है।

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

Bikhre sher

हैं दो ही सूरतें जिनमें कोई दीवाना होता है,
यकायक प्यार में हो, या मुसलसल प्यार से खारिज।
* मुसलसल- लगातार

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

Ghazal

न जानूँ ख्वाब है कोई, इबारत या सनम की है,
कभी ऐसा भी लगता है, शरारत ये कलम की है।

वही है आरज़ू अब भी, जुनूँ वैसा ही पाने का,
नहीं टूटा हूँ, कोशिश खैर तूने दम-ब-दम की है।

बहुत आसान है कहना, वजह जाहिर न हो जब भी,
भुगतना होगा ही तुझको, ये गलती उस जनम की है।

बड़ा ही दोगला हूँ, अर्जियां खारिज जो हो जाएँ,
बुतों को देख कहता हूँ, ये सूरत ही वहम की है।

दफ़न हैं फाइलों में नज़्म मेरे, इक ज़माने से,
बहुत कुछ चाहने ने, चाह मेरी इक भसम की है।