बुधवार, 3 अप्रैल 2013

Ghazal

न जानूँ ख्वाब है कोई, इबारत या सनम की है,
कभी ऐसा भी लगता है, शरारत ये कलम की है।

वही है आरज़ू अब भी, जुनूँ वैसा ही पाने का,
नहीं टूटा हूँ, कोशिश खैर तूने दम-ब-दम की है।

बहुत आसान है कहना, वजह जाहिर न हो जब भी,
भुगतना होगा ही तुझको, ये गलती उस जनम की है।

बड़ा ही दोगला हूँ, अर्जियां खारिज जो हो जाएँ,
बुतों को देख कहता हूँ, ये सूरत ही वहम की है।

दफ़न हैं फाइलों में नज़्म मेरे, इक ज़माने से,
बहुत कुछ चाहने ने, चाह मेरी इक भसम की है।

सोमवार, 11 मार्च 2013

Ghazal

ये जो दरमयाँ है हमारे- तुम्हारे,
उसी रब्त से कम हुए फासले हैं।

झुलसते हुए दिन लगें चाँद-रातें,
मुहब्बत के कैसे नए सिलसिले हैं।

है मुश्किल बहुत चाहना पर करें क्या,
अजब सी वो खुद से अहद कर चले हैं।

तुझे सोच कर बेसबब मुस्कुरा दूँ,
वजह सोचने में कई मस-अले हैं।

मैं पढ़ पाऊँ तुझको, तू मुझको समझ ले,
इसी आरजू में कई शब् ढले हैं।

तेरे हाथ को थाम लूँ, दे इजाज़त,
पसारे हुए बाँह मीलों चले हैं।

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

Ghazal

देख लो, ये ज़िन्दगी-ए-आम है,
भूख खौली, बासी ठंडी शाम है।

किसकी खातिर मैं यहाँ रातें जगूँ,
दूर जा बैठा मेरा घनशाम है।

इक शज़र पे मैंने लायी है खिज़ां,
सर पे मेरे ये नया इलज़ाम है।

तर्क-ए-उल्फत सोच कर रोये मगर,
अब यहाँ आराम ही आराम है।

मुड़ न पाओगे, जो उस जानिब गए,
बच के चलना, राह-ए- सच बदनाम है।

शौक से जलते नहीं चूल्हे कभी,
शायरी इक भूलता सा नाम है।

बुतकदों में ढूंढता हूँ फिर तुझे,
फिर मुझे तुझसे पड़ा कुछ काम है।

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

Ghazal

इसी को सोच कर आँखों से कुछ आँसू मचल निकले,
जिन्हें था जिन्दगी समझा, वो जीने का शगल निकले।

जो बिखरी सीपियाँ हैं, रेत पे साहिल की, माजी के,
उन्हीं में ढूंढ लो शायद, कहीं मेरी ग़ज़ल निकले।

कदम थे साथ रक्खे, उंगलियाँ थामे रहे मेरी,
मगर जब लडखडाया मैं, तो छोड़ा, और संभल निकले।

जो तेरी आरिजों पे हैं, मेरे आंसू नहीं लगते,
ये ग़म साझा नहीं जिससे, तेरी आँखें सजल निकले।

खुदी से हार कर खुद मैं, तेरे क़दमों में आया हूँ,
तू ही दे मशविरा कोई, कहीं रस्ता सरल निकले।

बुधवार, 23 जनवरी 2013

Bikhre sher

बहुत कुछ धुल गया है, मुफलिसी की बारिशों में पर,
हथेली से हैं चिपकी, अब भी बेजाँ सी तमन्नाएँ.