रविवार, 13 जनवरी 2013

Ghazal

बनूँ मैं तुझसा किस तरहा, अलग सा अब ज़माना है,
तुझे दुनिया की परवा थी, मुझे बस घर बचाना है।

कोई ऐसा मिले जो आज भी समझे तेरी बातें,
जिसे पूछूँ वो कहता है, अभी तक तू दिवाना है।

बहुत रोका है सूरज को, हरेक दिन शाम होने तक,
मगर उसको भी शायद, दिन ढले ही घर को जाना है।

सफ़र में धुप है तीखी, सबर रखना बहुत मुश्किल,
अभी गुजरी है दो-पहरी, ये पूरा दिन बिताना है।

कयासें सच सी हैं लगती, है गिरना तयशुदा मेरा,
बचे हैं होश लेकिन सामने, सारा ज़माना है।

रहा है तू नहीं गाफिल मेरे हालात से हमदम,
मगर फिर भी है सुनना तुझसे कुछ, तुझको सुनाना है।

बड़ी बेबस सी राहें हैं, जो मंजिल तक नहीं जाती,
इन्ही पर चलना है हमको, सफ़र यूं ही बिताना है।

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

जगजीत के लिए..

जिसने पहले- पहल ग़ालिब से मिलाया था मुझे,
तपती दुपहरी में देस का चाँद दिखाया था मुझे,
वो कि जिसने मुझे रातों को जगाये रक्खा,
पौ फटे रोज़, फिर जिसने सुलाया था मुझे,

हरेक नज़्म थी ऐसी, कि इबादत हो कोई,
किसी फकीर के होठों पे शिकायत हो कोई,
वो तो जिस राह से गुजरा, वहीँ पे खेमे लगे,
यूँ लगा, शख्स नहीं जैसे बगावत हो कोई.

वो जो हरदिल-अजीज़ था,मेरा था राहनुमा,
सुना है आज वो शख्स मुझे छोड़ गया.

जगजीत के लिए (जो अब भी यादों में है)

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

आमीन

बहुत दिनों बाद आज मिला जिससे, वो अज़ीज़ था मेरा.
कई साल साथ गुजारे थे हमने.
कभी नुसरत को सुना था, कभी खुसरो की दुहाई दी थी.

हर वक़्त आँखें चमकती थी उसकी, एक विश्वास से.
एक जोश निहा था उसकी बातों में, हर वक़्त.
बेपरवाह ज़माने से इतना, कि "जय माता दी" के शोर में भी,
"अल्ला हू" की तान जोड़ दे.
और शराबखानों में ऐलान कर दे, " आज व्रत है मेरा, माफ़ करना".

पर आज जब वो मिला, तो परेशान था,
हार कर खुद से, नज़रें चुराता रहा.
बहुत कहा मैंने -
"आज की रात रूक जा, मैं सहेजूँगा तेरे ज़ख्म.
मेरे कितने दर्द संभाले हैं तूने, आज क़र्ज़ उतार लेने दे."

आँखों की नमी छुपाता हुआ, बोल पड़ा वो -
" दोस्त जाने दे अब, बहुत देर हो चुकी है."

वो वादा कर के गया है, फिर मिलूँगा,
जब हालात सुधर जायेंगे.

जाने किस डर से, दुआ में उठ गए मेरे हाथ,
और कांपते लफ़्ज़ों में, बेसाख्ता मुँह से निकल पड़ा मेरे.
आमीन.....

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

जुड़वें

मेरी सोच और वो, जुड़वें हैं दोनों.
शायद मिनटों का ही फासला होगा हमारे बीच.
और राब्ता इतना गहरा, कि एक पल भी दूर नहीं रह पाते हम.
कभी एक दिन के लिए बिछड़ जाऊं, तो ढूंढ ही लेता है मुझे.

राह चलते कभी तपाक से गले लग, कहता है "पहचाना?".
मैं मुस्कुराकर थाम लेता हूँ हाथ उसका, और चल पड़ता हूँ आगे सफ़र पे.

अब तो यकीं हो चला है मुझे, कोई और साथ हो न हो,
मेरी सोच कि हाथ थामे, हमेशा चलेगा, मेरा दर्द...

गुफ्तगू

मैं पूछता ही रहा उससे :
" किस बात का गम है तुझे,
क्यूँ इस कदर नाराज़ है, सारे ज़हां से,
तेरी हर नज़्म क्यूँ डूबी हुई है, दर्द की चासनी में."

वो हर बार मुस्कुराकर कहता,
कुछ नहीं सब ठीक ही तो है.

पर आज जाने क्या हुआ,
अनमने ढंग से वो बोल पड़ा:
"क्या कर पाओगे तुम मेरी खातिर?
जब भी कोशिशें की मैंने नज़्म लिखने की, चाहत भरी,
हर्फ़ फीके पड़ गए.
मानो किसी शरारती बच्चे ने घोल दिया हो दर्द का पानी,
मेरी स्याही में.
अजीब सा रंग है ये, ख़ुशी उभरती ही नहीं
और दर्द गहरा उतरता है, कागज़ पर.
हो सके तो कल ले आना, खुशियों वाली स्याही बाज़ार से.
क्या कर पाओगे इतना?"

इतना कह खामोश हो गया वो.
पर मैं तब से बैठा हूँ, गुमसुम सा,
लिए आईने को गोद में...