शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

बच्चे कुछ जल्दी बड़े हो गए

आजिज़ हो तुम आज इन सवालों से,
क्या नया किया उसने?
क्या आज उसने मेरा नाम लेकर पुकारा मुझे?
क्या आज उसके कदम बढ़ सके खुद-ब-खुद?

इन सवालों पर झुंझलाकर कहती हो कि,
ये सब वक़्त के साथ ही होगा,
अभी बहुत छोटा है हमारा बच्चा.

पर मैं बेताब सा इस इंतज़ार में हूँ,
कि कब वो बड़ा हो और थाम ले,
मेरे सपनो कि ऊँगलियाँ.

इस सोच से कभी-कभी डर भी जाता हूँ,
क्या पता कि सपनो के साथ वो इतना आगे न चला जाये
कि हम सब धुंधले से दिखें उसे.
मेरी तरह वो भी बस हफ्ते के १० मिनट दे पाए घर को.

डरता हूँ कहीं किसी सूने से घर में बैठे हम दोनों,
खाली आँखों से ये सवाल ना करें,
" तुम्हे नहीं लगता कि बच्चे कुछ जल्दी बड़े हो गए"...

वो हमारी दोस्ती की शर्त भी ठुकरा गए

जाते-जाते पन्नों पर, कुछ हर्फ़-ए-नम बिखरा गए,
कुछ किया ऐसा कि गीली जीस्त वो सुलगा गए.

मेरे सर को सजदों के रिश्ते, थे गुज़रे नागवार,
वो हमारी दोस्ती की शर्त भी ठुकरा गए.

एक कतरे की कदर जब, हम ना कर पाए कभी,
यूँ किया कि दरिया में रख, प्यास को तरसा गए.

"इस इबादत से भला, अब तक मिला क्या मोहतरम",
पूछा तो अब्बू ने बस, सदका किया, मुस्का गए.

जीनत हो दुश्मन की भी, पर चौक पे अच्छी नहीं,
देख कर रस्म-ए- अदावत, हम बहुत शरमा गए.

दुआओं का मुझतक असर नहीं आता

वो मेरे साथ है फिर क्यूँ नज़र नहीं आता,
बात में उसकी कभी मेरा जिकर नहीं आता.

दुआएं माँ की हर वक़्त मेरे नाम रही,
मगर दुआओं का मुझतक असर नहीं आता.

मैं आबलापा हूँ, है जलता हुआ सफ़र मेरा,
मेरी तलाश में एक भी शजर भी नहीं आता.

वही है चेहरा, वही दर्द उसकी आँखों में.
मगर ये अक्स मेरा, मुझसा नज़र नहीं आता.

हूँ उसकी राह में पलकें बिछाए मैं कबसे,
है इतना इल्म उसे, फिर भी इधर नहीं आता.

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

चाय की टपरी

आज बहुत बरस बाद फिर उसी राह से गुज़रा,
सब वैसे का वैसा था.
मानो इस गली ने बंद कर रक्खे हों,
अपनी सारी खिड़कियाँ और दरवाज़े.

कोई बदलाव ना आने सके, इसलिए नुक्कड़ पे पान वाले ताऊ ने,
आज भी विविध भारती बजाये रक्खा है.

पर मैं शायद बदल गया, आते ही रौब से कहा,
"एक स्पेशल चाय दे बे, छोटू"
सहम सा गया वो, पूछा तक नहीं उसने तुम्हारे बारे में,

और गर पूछ बैठता भी, तो क्या बताता मैं,
कि अब तुम्हे टपरी की चाय नहीं भाती,
या ये कि अब नहीं पीते उधार की तुम,
ना ही पूछते हो किसी छोटू से ,
" पाँच का पहाड़ा याद हुआ तुझे?"

अपने बदलाव को सोचते हुए उठ खड़ा हुआ ,
दस का नोट टेबल पे रख, अभी निकला ही था,
कि छोटू ने आवाज़ लगायी,
"साहब, आपके छुट्टे"

शर्मिंदा सा, वो टिप उठाये, चला आया था मैं.

इस ख़त के साथ, वही कुछ सिक्के, पिछली यादों के,
भेज रहा हूँ.

इन्हें देख, अगर याद आये गली की तुम्हे,तो आ जाना,
मैं इंतज़ार करूँगा हर शाम,उसी चाय की टपरी पर...

रविवार, 4 सितंबर 2011

प्यास को तरसा गए

जाते-जाते पन्नों पर, कुछ हर्फ़-ए-नम बिखरा गए,
कुछ किया ऐसा कि गीली जीस्त वो सुलगा गए.

मेरे सर को सजदों के रिश्ते, थे गुज़रे नागवार,
वो हमारी दोस्ती की शर्त भी ठुकरा गए.

एक कतरे की कदर जब, हम ना कर पाए कभी,
यूँ किया कि दरिया में रख, प्यास को तरसा गए.

"इस इबादत से भला, अब तक मिला क्या मोहतरम",
पूछा तो अब्बू ने बस सदका किया, मुस्का गए.

जीनत हो दुश्मन की भी, पर चौक पे अच्छी नहीं,
देख कर रस्म-ए- अदावत, हम बहुत शरमा गए.