मैं तुम्हें अब भूल जाऊँ ,ये मेरी फितरत नहीं।
तू मुझे पर याद रक्खे, ये तेरी आदत नहीं।
हमसफ़र हो सकता हूँ मैं, दर्देगम की राह में,
मुश्किलों में रहनुमा हो, ये मेरी सोहबत नहीं।
पहले थे हम मोहतरम, अब "तू" का उन्वा हो गए,
आइना भी बोल उट्ठा, कुछ बची शोहरत नहीं।
जब तुम्हें समझा सकूँ, अरसे से हूँ मैं मुन्तजिर,
उससे पहले टूट जाऊँ, इतनी कम उल्फत नहीं।
शनिवार, 19 फ़रवरी 2011
शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011
गीला सा चाँद
एक रात यूँ ही , जब देख रहा था मैं चाँद,
आवाज़ सुनी मैंने रोने की
देखा एक फूल सा बच्चा रो रहा था।
पूछा जब मैंने, तो असहाय गुस्से से, उसने कहा-
" झूठ कहते हैं सब, पापा भी,
कि मर गयी मेरी माँ।
अभी अभी तो देखा है मैंने उसे, चाँद में,
आप बोलो, आपने भी तो देखा था न, अभी-अभी। "
मैं हिम्मत नहीं जुटा सका , सच कहने की।
और तब तक, पिछली सारी बातों से बेखबर,
वो देखने लगा था, फिर चाँद को।
उभर आया था उसकी पनियाई आँखों में,
फिर एक गीला सा चाँद।
An old poem, written around 2002. Found my treasure diary, few days back :-)
आवाज़ सुनी मैंने रोने की
देखा एक फूल सा बच्चा रो रहा था।
पूछा जब मैंने, तो असहाय गुस्से से, उसने कहा-
" झूठ कहते हैं सब, पापा भी,
कि मर गयी मेरी माँ।
अभी अभी तो देखा है मैंने उसे, चाँद में,
आप बोलो, आपने भी तो देखा था न, अभी-अभी। "
मैं हिम्मत नहीं जुटा सका , सच कहने की।
और तब तक, पिछली सारी बातों से बेखबर,
वो देखने लगा था, फिर चाँद को।
उभर आया था उसकी पनियाई आँखों में,
फिर एक गीला सा चाँद।
An old poem, written around 2002. Found my treasure diary, few days back :-)
रविवार, 23 जनवरी 2011
अथर्व, तुम्हारे लिए
जुड़ना एक नाम का, शरीर से
कोई छोटी घटना नहीं।
किसी नोवेल का प्लाट है ये,
या किसी ग़ज़ल का पहला हर्फ़।
आज एक नाम देकर तुम्हें, खुश हो जायेंगे सब।
पर तुम... तुम्हें तो शायद पता भी नहीं होगा
कि एक नाम के साथ, मेरे सपनो का बोझ भी,
ता-उम्र चलेगा तुम्हारे साथ।
कुछ ख्वाब अधबुने से दूंगा तुम्हें, विरासत में,
और उसी बोझ तले बड़े होगे तुम।
मैं खुश होता देखता रहूँगा तुम्हें, दबते उस बोझ तले।
और एक दिन, इन्ही पन्नो पे लिखोगे तुम
अपने अधबुने ख्वाबों की कहानी।
जानता हूँ, पर क्या करूँ
एक अजीब, सदियों पुरानी परंपरा है ये विरासत।
सोमवार, 22 नवंबर 2010
पापा
एक हाथ से थामी थी आपने मेरी नन्ही उँगलियाँ
और दूसरे से रास्ता दिखाया था।
कभी कहानियाँ सुनाकर, कभी प्यार से समझाकर।
आज भी उसी रास्ते पर चला हूँ मैं,
कई बार डगमगाया, लडखडाया, पर आपने थाम ली मेरी नन्ही उँगलियाँ।
और कहा "try, try, till you succeed".
अब भी बहुत लम्बा सफ़र है तय करना,
रास्ता शायद पता है मुझे, और डर भी नहीं लगता अब,
क्योंकि जानता हूँ,
थाम लेंगे एक हाथ से आप मेरी नन्ही उँगलियाँ ......
और दूसरे से रास्ता दिखाया था।
कभी कहानियाँ सुनाकर, कभी प्यार से समझाकर।
आज भी उसी रास्ते पर चला हूँ मैं,
कई बार डगमगाया, लडखडाया, पर आपने थाम ली मेरी नन्ही उँगलियाँ।
और कहा "try, try, till you succeed".
अब भी बहुत लम्बा सफ़र है तय करना,
रास्ता शायद पता है मुझे, और डर भी नहीं लगता अब,
क्योंकि जानता हूँ,
थाम लेंगे एक हाथ से आप मेरी नन्ही उँगलियाँ ......
रविवार, 7 नवंबर 2010
क्या सोचा है...
क्या सोचा है लाइफ के बारे में?
उस दिन पूछा था तुमने ...
तकरीबन ९ बजे होंगे,
इक्का-दुक्का लोग हॉस्टल की सडकों पर
धुआंई ठहाकों के साथ घूम रहे थे.
आखिरी दिन था कॉलेज का शायद ...
खैर तुमने पूछा था ...
"क्या सोचा है लाइफ के बारे में "।
मैं यक -ब -यक सहम सा गया .
टाल दी बात ये कह कर की,
देखा है कभी लैम्प पोस्ट को ..
कितना करीब है ये और रौशनी भी है तेज ,
फिर क्यूँ भागूं मैं चाँद के पीछे ...
तुम हँस दिए, सर पे हाथ फेरा और कहा खुदा हाफिज़...
तब से आज तक शक्ल नहीं देखी तेरी, बस कुछ आवाजें हैं
जो अँधेरे में भी बज उठती हैं, और पूछती हैं...
"क्या सोचा है लाइफ के बारे में"?
उस दिन पूछा था तुमने ...
तकरीबन ९ बजे होंगे,
इक्का-दुक्का लोग हॉस्टल की सडकों पर
धुआंई ठहाकों के साथ घूम रहे थे.
आखिरी दिन था कॉलेज का शायद ...
खैर तुमने पूछा था ...
"क्या सोचा है लाइफ के बारे में "।
मैं यक -ब -यक सहम सा गया .
टाल दी बात ये कह कर की,
देखा है कभी लैम्प पोस्ट को ..
कितना करीब है ये और रौशनी भी है तेज ,
फिर क्यूँ भागूं मैं चाँद के पीछे ...
तुम हँस दिए, सर पे हाथ फेरा और कहा खुदा हाफिज़...
तब से आज तक शक्ल नहीं देखी तेरी, बस कुछ आवाजें हैं
जो अँधेरे में भी बज उठती हैं, और पूछती हैं...
"क्या सोचा है लाइफ के बारे में"?
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